Sunday, April 08, 2012

Vimal



It's not just a name and it's not just a person, it's an element, it's a vibration. Essentially I am not going to write about this person, I am going to write about the connection between Vimal and Me and for that it becomes necessary to know the person and write something about that person too.

विमल...ये नाम मेरे जेहन में २००८ में आया था, पहली बार जब इन्टरनेट पे ऑनलाइन बात हुई थी तभी से लगा की कुछ तो अजीब सा रिश्ता है, एक अनजानी डोर से बंधा हुआ रिश्ता, फिर जब फ़ोन पे बात हुई तो रिश्ते में एक और गहराई का एहसास हुआ की कुछ तो बात है। क्या बात है अच्छे से पता नहीं लेकिन कुछ तो है। हम कई बार ख़ामोशी या संकेतों में बात करते थे और बहुत ही अन्दर छू लेनी वाली बात थी की कोई मेरे इशारों को इतनी आसानी से समझ लेता है और किसी की ख़ामोशी को मैं समझ लेता हूँ। बात करते हुए दिमाग का भी हाथ होता है लेकिन सिर्फ दिमाग का हाथ नहीं होता है, कुछ  और भी है जिसका हाथ होता है।

फिर २००९ जनुअरी में हमलोग भोपाल रेलवे स्टेशन पर ५ मिनट के लिए मिले थे और कुछ कारणों की वजह से मैं उस ५ मिनट के वक़्त को अच्छे से पी नहीं पाया, शायद मैं कुछ और बातो से भरा हुआ था और मुझे अफ़सोस है की वो ५ मिनट का वक़्त मेरी मुट्ठी से फिसल गया । लेकिन उस वक़्त की खुशबू कहीं न कहीं मेरे अस्तित्व पे एक निशान छोड़ गयी और मैं उससे खाली होकर मिलना चाहता था.....And the time appeared in a marvelous form in 2012 at Jaipur.

कुछ वक्त होता है
जिसे हम वक्त नहीं कह सकते 
वो कुछ और होता है....
क्योंकि वक्त वो है
जो बहता रहता है
अहिर्निश... 
निरंतर...

वो वक़्त नहीं था
जब मैने उसे 
इतने करीब से महसूस किया था 
इतने करीब से उसे बहता हुआ देखा
और जितना हो सका 
उतना पीता गया...
ये सिर्फ एक ठहरी हुई खामोशी थी
जिसमें हम दोनों
पिघले हुए रूह थे...

जैसे कहीं जमा हुआ 
मन का बर्फ पिघल रहा हो 
और सुबह के आकाश में
स्वम्भू को उतरते हुए  
देख रहा हूँ...

वो वक़्त नहीं था
कुछ और था....

Vimal is the finest objectivity of unedifying not me in the form of body. It can’t be expressed, It can’t be said, It can't be written, It can't be spoken, Only it does exist. 

कुछ बातें होती है जिसे हम शब्दों में नहीं कह सकते, जिसका कोई मतलब भी नहीं होता है, और जिसकी कोई भाषा नहीं होती, या फिर कहना चाहिए की वो बातें नहीं होती है, वो एक अनुभव होता है, जिसे हम सिर्फ जी सकते हैं, अनुभव कर सकते हैं। विमल से शब्दों और खामोशी में तो बहुत बातें की हैं मैंने, लेकिन उसके साथ रूबरू होना या फिर कहना चाहिए की सिर्फ होना, एक अनूठा अनुभव है, सिर्फ एक अनुभति होती है, की कुछ बह रहा है, जैसे की एक पिघली हुई मूर्ति.... जो बनती भी है और पिघलती भी है ... एक ही क्षण में ...

बस खामोशी होती थी
कुछ धुआँ होता था...
कुछ शब्द चिपके रहते दीवारों पे
कभी हवा उन दीवारों से टकराती
तो उन शब्दों से कुछ अल्फाज़ निकल आते
कुछ नज्में बन जाती 
कुछ ख्याल उभर आता ...
कुछ कल्पनाएँ अवतरित हो जाती ....
जहाँ चाँद भी दस्तक नहीं देता
जहां अंधेरा भी सुस्ती के साथ
कोने में रहता...

फ़क़त खामोशी
और एक होने का एहसास 
और दो जिंदा सांसें कायम रहती ....

कभी चुपके से
कुछ पन्नो की आवाज होती
दोनों की आंखें
उस आवाज को जज़्ब कर लेते,
कुछ कहती वो आंखें
कुछ सुनती वो आंखें,
कभी दीवारों के भी पार
देख लेती वो आंखें,

या फिर ये कहूँ की
बस होती थी वो आंखें
साँस लेती वो आँखें .....


We did spent awesome time there. As a day cycle, get up in morning and get fresh without any jhanjhat and chik chik or tension to do something or to go to office, we were only going nowhere. For morning breakfast we had found an amazing place to eat Aloo puri or Paratha and some tea and some smoke.... woow life seems to be like treating me. The happiness was happy and the color was colorful just by looking into our eyes and faces. And the BC begins we used to do some poetry, some BC, some crap, some nonsense talk, and sometime very sensible but who knows there is a sense in a nonsense also, might be it's all nonsense all we call sense is nothing but a pathetic nonsense, and a better nonsense is really a nonsense. We used to talk nonlogical, unorganized, Jibrish, random, symbolic, poetic, imaginative but very existential.

And we reach Diggi palace, mmm quite colorful, decorated, vibrant, huge amount of girls and guys too and quite a feeling of festival and a sort of Mela. And I must appreciate the beauty of those girls, yes Jaipur is an amazing place, almost all, approximately 98% of girls are awesome. You throw any random coin in air and when it falls on any girl, trust me you won't be disappointed, they are elegant, they are beautiful, they are marvelous, they are watchable, they are writable, they are thinkable, they are imaginable.... they signify the existence of female co-related with art when God would have thought them to create, yes they are :)

And almost whole day we used to do Digg, Digg and Digg.... And I saw first time Gulzar saab, and we both were silent for hours, just watching Gulzar saab seems like satisfying the poetic thirst, and when he recite his poetry...aaahh, It's amazing experience.

इस घर की उपरी मंजिल पे
अब कोई नहीं रहता
ऊपर की जाती ये सीढियाँ
अब ऊपर को नहीं जाती ....

Its like silence travel in space and if you are open you can drink the intoxication of Gulzar saab and live in silence, It's a meditation.

And the time we come back to Konark palace we used to do just BC, poetry and silencification. BC is not just a BC, it is much more than intellectual talk  and a mental catharsis. Everyone has an opinion about BC and almost every body think that it'a time pass tantrum, but I believe BC is our psychological food. As you eat, drink and smoke the neurotransmitters; like potato, walnut, chocolate, dope, coffee etc; they trigger happy hormones, BC triggers the euphoria of good-good feeling of feeling light. It is like someone is listening, and you are throwing your electrons outside and ultimately you complete your valency and you feel kool. BC is not just a BC, it's a natural process of relaxation otherwise people are not idiot to adopt such stuff in heavy population. The major stupidity is we classify BC in a bad term, that our moral part denies to accept, we are lacking the acceptance and integrity, otherwise BC is a primal fact of basic meditation.

Talking about Vimal without his poetry is incomplete, as like talking about sunrise and there is no sun. Vimal's poetry is quite different, the abstraction, the connection, the elements of it, it's something very fascinating. It's not about his ability to write, it's more about he is blessed with the experience to live experience and express in words. And of course he express it so well that creation become a masterpiece. As like this, one of my favorite and one the finest I've ever heard.....

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रोज़ जब,
शाम ज़मीं की पेशानी पर उंगलियां रखती है,
और रात,
किसी पहाड़ी के पीछे से,
घर लौटते परिंदो के पंजो से,
चुपके चुपके ऐसे चली आती है के उसके आने का भी अहसास नही होता,

और फिर ,
रात,चांद और शाम,
तीनो....
लम्हे भर के लिए मिलते है,
रोते है, आंसू बहाते है,

यही ज़मी पर,

मैं सोचता हू,
ज़मी भी तो रोती होंगी कहीं...??

वो कौन सी जगह है,
जहां ज़मी रोती है..?

मुझे वहां ले चलो....!!
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I don't want to appreciate mare poetry at here, the purpose of this writing to express the experience of Vimal, and since poetry is one of Vimal's finest creation and which touched me that is why I must recall the masterpieces. Above poetry is not just a poetry it's an experience which can only be observed. You try 1000 times to write it, you won't be able to write, just try one time to observe it, and if you have a little bit of expression ability you would be able to project it beautifully. 

And here is the historical and masterpiece of all the time, It's a timeless creation.

ये नज़्म सिर्फ नज़्म नहीं है, जब मैंने इसे पहली बार पढ़ा था तब उसी वक़्त कहीं खो गया था और मुझे पूरा विश्वाश है की विमल ने जब इसे लिखा होगा वो भी कहीं खो गया होगा, क्यूंकि ऐसी रचना सिर्फ खो कर ही रचित की जा सकती है आह्हह्ह्ह .... इसमें एक दर्द है, एक ख़ामोशी है, एक ठहराव है, जो धीमे धीमे उतरता है और अपना रूप और आकर मेरे मन पर उतार जाता है ....अद्भुत !!!! 

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वो संगतराश अजीब है,
पानीयो को तराशता रहता हैं
वो नाउम्मीदी की हवा मे तितलियो के बीज बोता है..

उसके खून से मिट्टी की खुशबू आती है,
उसकी आंखो पर आंख रख दो तो सारी खामोशिया पिघल जायेगी,

जिसे तुम खाक़ कहते हो,
वही तो है जो पत्थर को खुश्बू बक्शता है,

वो सज़ा नही, वो साज़ है,
वो किसी दश्त-ए-अदम की आवाज़ है,

उसके कांधे पर भी होगा सलीब एक दिन,
वो खुशी खुशी ज़ेहर भी पी जायेगा...
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ये वो रचना है जो खामशी के भी पार है, जहाँ पर ख़ामोशी खुद ठहर कर सांस लेती है और खुद से कहती है थोडा मैं और ठहर जाती हूँ। जहाँ आँखों के आंसू भी रोते हैं और जहाँ जिस्म से परे रूह की कल्पना में उस अनंत की खोज है जो अद्वैत है, और उसकी कल्पना इतनी गहरी और इतनी अद्भुत है की जहाँ महसूस होता है की इसे मैं जी रहा हूँ, ये मेरे ऊपर उतर रहा है ... और अनजाने में एक प्यास भी उभर आती है की ...कब मैं वो जहर पियूँगा. कल्पना से भी कहीं आगे उतर जाती है ये नज़्म ... शायद Jesus, Socrates, बुद्ध और मंसूर ... ऐसे कई नाम है जिन्होंने इस नज़्म को पिया होगा, ये परमात्मा की कृपा है की विमल पर उतरी है...

मैं सदियों से या शायद जन्मो से
एक खुली हुई खिड़की से
देखता रहता हूँ....

कभी जीवन
कभी मृत्यु
कभी ख्वाहिशें
कभी कल्पनाएँ

कभी कभी
एक वक़्त होता है
जब मैं खुद को देख पता हूँ.....

2 comments:

Rakhi Sharma said...

Deep ......... Lafz Kamm Hai, Ehsaaso Ka Samandar Hai, Ek Khamoshi Si Hai Yaha, Phir bhi Baato Ke Jamghat Hai

nazmowala said...

abhi paani ka ek ghoot peete peete, gilaas table par rakh dia maine..jaise , paani ko, gilaas aur table ko ni pta ki kyun rakh dia , achanak...mujhe bhi nahi pta..
par shayad pta hai,
paani ke kan kan ko,table ke poorvaj purane darkhto tak ko jaise pta hai, jaise gilaas ke gilaas ho jane ke pahle...un patthro ko ..sab kuch pata hai...waise
tujhe bhi pta hai shayad...